HomeHISTORYस्वदेशी आंदोलन: आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई (Swadeshi Movement)

स्वदेशी आंदोलन: आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई (Swadeshi Movement)

स्वदेशी आंदोलन: आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई

स्वदेशी आंदोलन (Swadeshi Movement) भारत के इतिहास में एक बड़ा मोड़ था। यह आंदोलन 20वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुआ। इसका लक्ष्य था, भारतीयों को ब्रिटिशों के शासन से आज़ादी दिलाना। जब ब्रिटिश राज ने भारत के संसाधनों का दुरुपयोग करना शुरू किया, तब लोगों में जागरूकता बढ़ने लगी और आक्रोश भी। यह आंदोलन एक तरह से स्वावलंबन को बढ़ावा देने और ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करने पर केंद्रित था। यह भारतीय राष्ट्रीयता को एक नई दिशा देने वाला था।

इस लेख में, हम स्वदेशी आंदोलन के इतिहास पर नज़र डालेंगे। साथ ही यह देखेंगे कि इसके पीछे क्या सोच थी, कौन से नेता थे जो इसमें शामिल थे, और इस आंदोलन की शक्तियों का क्या प्रभाव पड़ा।

स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई

स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 1905 में हुई। ब्रिटिश वायसराय लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया था। यह विभाजन सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं था। इसके पीछे एक बड़ा मकसद था। वह था हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच भेदभाव बढ़ाना। बंगाल उस समय आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। इसके विभाजन से लोगों में असंतोष आ गया।

विभाजन का विरोध तुरंत शुरू हो गया। लोग इसे अपनी एकता पर हमला मानने लगे। बंगाल में और फिर देश के अन्य हिस्सों में भी लोग एक साथ आए। उन्होंने ब्रिटिश चीजों का बहिष्कार करना शुरू किया। यह केवल विरोध की आवाज नहीं थी। यह उनकी आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए उठी आवाज थी।

आर्थिक और राजनीतिक बहिष्कार

स्वदेशी आंदोलन के दो मुख्य तरीके थे। एक तो आर्थिक बहिष्कार और दूसरा राजनीतिक बहिष्कार।

आर्थिक बहिष्कार

इसका मकसद था, ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करना। ब्रिटिश वस्त्र भारतीय बाजार में छा गए थे। इससे भारत के कारीगरों और उद्योगों को नुकसान हो रहा था। बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ रहे थे। इसलिए, आंदोलन ने स्वदेशी उत्पादों का उपयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

  • ब्रिटिश वस्त्रों का बहिष्कार: लोगों से कहा गया कि वे विदेशी वस्त्रों का उपयोग न करें। खादी जैसे स्वदेशी कपड़ों को पहनने के लिए प्रेरित किया गया।
  • स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा: भारतीय हस्तशिल्प और उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया।
  • स्वदेशी दुकानें: व्यापारियों से अनुरोध किया गया कि वे केवल स्वदेशी उत्पाद बेचें।

राजनीतिक बहिष्कार

  1. यह ब्रिटिश संस्थाओं के साथ सहयोग करने से इनकार करने का एक तरीका था। इसमें ब्रिटिश शिक्षा, न्यायालय और विधानसभाओं का बहिष्कार शामिल था।
  • ब्रिटिश वस्त्रों का बहिष्कार: भारतीयों ने ब्रिटिश सेना में शामिल होने से मना कर दिया।
  • सरकारी सेवाओं से इस्तीफा: कई सरकारी कर्मचारियों ने अपने पद से इस्तीफा दिया।
  • विदेशी संस्थाओं का बहिष्कार: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश-प्रबंधित स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार करने का आह्वान किया।

इन दोनों तरीकों से आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के दबदबे को कमजोर करने और भारतीयता और स्वावलंबन की भावना को जगाने का प्रयास किया।

स्वदेशी आंदोलन में प्रमुख नेता

इस आंदोलन में कुछ प्रमुख नेता शामिल थे, जिन्होंने लोगों को जागरूक किया और विरोधों का आयोजन किया।

  • लाला लाजपत राय :
  • पंजाब के एक बड़े नेता, लाजपत राय इस आंदोलन के सबसे मुखर समर्थकों में से एक थे। वे चाहते थे कि लोग स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करें। उन्होंने लोगों को ब्रिटिश माल से बचने और खादी अपनाने के लिए प्रेरित किया।
  • बिपिन चंद्र पाल :
  • पाल ने इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। उनका मानना था कि भारतीयों को अपने संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहिए। उन्होंने औद्योगिक और शैक्षिक संस्थानों के विकास पर जोर दिया।
  • सुभाष चंद्र बोस :
  • बोस भी इस आंदोलन से गहरे प्रभावित थे। उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की और कहा कि भारत को आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए स्वदेशी आंदोलन के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव

स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला। इसने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई दिशा दी।

  • राजनीतिक प्रभाव: इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एकजुट किया। इससे नई राजनीतिक संस्थाएँ बनीं और लोगों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुहिम चलाई।
  • आर्थिक प्रभाव: इस आंदोलन ने स्वावलंबन के विचार को प्रोत्साहित किया। स्वदेशी उद्योगों का विकास हुआ, विशेषकर वस्त्र उद्योग में।

स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय संस्कृति के प्रति नई रुचि उत्पन्न की। खादी का उपयोग केवल एक कपड़ा नहीं था, बल्कि यह अपने आप में एक प्रतीक बन गया था। यह बताता है कि भारतीय लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए खड़े थे और वे ब्रिटिश वस्त्रों का विरोध कर रहे थे

इस तरह, स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों के मन में एकता और शक्ति का उपदेश दिया। यह संघर्ष आज़ादी की दिशा में एक बड़ा कदम था।

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